बुधवार, 3 दिसंबर 2025

तन्हाई के नक्शे

 ग़मों की चौखट पर रौशनियाँ आती तो हैं मगर,

दिल की दीवारों में पुरानी दरारें हँसने नहीं देतीं।
हर खुशी दहलीज़ पर रुककर लौट जाती है,
मानो मेरी तन्हाई की इजाज़त बिना वो भीतर नहीं देतीं।

अब तो हाल ये है कि मोहब्बत भी डरकर आती है,
मेरी आँखों की ख़ामोशी को इल्ज़ाम दे जाती है।
कभी चाहतों का शहर था ये दिल,
आज वीरानी ही यहाँ के नक़्शे दिखाती है।

यादें भी अब सरक कर चुपचाप बैठ जाती हैं,
उनकी मुस्कानें भी अब मुझे छू नहीं पातीं।
हर मीठा लम्हा, हर पुरानी बातें,
सिर्फ़ खामोशी में गूँजती हैं।

सपनों के दीये अब बुझते हुए लगते हैं,
हर उम्मीद की लौ थककर हिचकिचाती है।
कुछ पाने की चाह अब डर में बदल गई है,
और दिल सिर्फ़ इंतज़ार की गली में खो गया है।

वक्त की ठंडी हवाएँ
मेरे अरमानों के फूलों को झुका देती हैं।
कभी जो रंगीन थे मेरे ख़्वाब,
अब सिर्फ़ धूल में मिलते हैं।

कभी हँसी की आवाज़ें
मेरे कमरे की दीवारों में गूँजती थीं,
आज सिर्फ़ खामोशी की टहलनियाँ
मेरे कदमों की आवाज़ें सुनती हैं।

मोहब्बत की परछाई भी
अब मेरे दरवाज़े पर झिझकती है।
दिल के वीराने में
कभी कोई फूल न उग पाया।

कुछ लम्हों की गर्माहट
अभी भी छुपकर आती है,
लेकिन मेरी आँखें अब
सिर्फ़ टूटे हुए ख्वाबों को पहचानती हैं।

दुनिया की रौशनीें चमकती हैं,
मगर मेरी तन्हाई उन्हें देख नहीं पाती।
हर खुशी की गूँज
मेरे भीतर की खाई में खो जाती है।

फिर भी दिल की कोई उम्मीद
चुपचाप जलती रहती है।
शायद एक दिन
इस वीराने में भी फिर हँसी आ जाएगी।

महेंद्र ‘मजबूर’©️®️

मंगलवार, 2 दिसंबर 2025

थक गया हूँ

 थक गया हूँ राहों पर चलते-चलते,

टूटे सपनों को जोड़ते-जोड़ते।

थक गया हूँ दिल के जख्म छुपाते-छुपाते,
ख़ामोशियों में अपने से बहस करते करते ।

थक गया हूँ उम्मीदों को सँवारते-सँवारते,
टूटी साँसों को फिर उठाते-उठाते।

थक गया हूँ रिश्तों को निभाते-निभाते,
खुद को ही हर रोज़ मनाते मनाते।

थक गया हूँ खुद से सवाल करते-करते,
किस्मत की दीवारों में टकराते-टकराते।

थक गया हूँ दर्द को दबाते-दबाते,
मुस्कानों के नक़ाब में छुपाते छुपाते।

थक गया हूँ नफ़रतों से दिल बचाते-बचाते,
अपनों की आँखों में सच ढूँढ़ते ढूँढते।

थक गया हूँ तन्हाई को साथी बनाते-बनाते,
सपनों को फिर से जगाते-जगाते।

थक गया हूँ फ़ैसलों को अकेले उठाते-उठाते,
ज़िंदगी के बोझ को समझते-समझते।

थक गया हूँ हालातों को आज़माते-आज़माते,
वक़्त की धारा में खुद को ढालते ढालते।

थक गया हूँ जंग को किस्मत से लड़ाते-लड़ाते,
हर बार नई उम्मीदें उगाते-उगाते।

थक गया हूँ गिरकर भी खुद उठाते-उठाते,
ज़िंदगी के सबक हर रोज़ निभाते-निभाते।

महेंद्र ‘मजबूर’©️®️

सोमवार, 1 दिसंबर 2025

रात ओढ़े फूलों-सी


रात ओढ़े फूलों-सी, हल्की-हल्की बयार,
हवा में घुलती यादों का बजता है झंकार।।

छूकर गुज़रे ख़्वाबों में, तेरी वो चांदनी,
मन कहे बस पास आ, दूरी अब ना रही।
दिल की धड़कन बोले, तुझपे ही है ऐतबार,
सांसों में बसी तू है, तू ही मेरा प्यार।।

तेरी हँसी में चमकी हैं तारों की कतार,
दिल के इस सागर में तू ही है पतवार।
सपनों की राहों पर संग चलें हम दोनों,
चाहत के इस मौसम में खिल उठे बहार।।

झील-सी तेरी आँखें, मोती-सा तेरा नूर,
बातें तेरी लगती हैं, जैसे मीठा सुरूर।
महकी-महकी चाहत, बिखरे चारों ओर,
तू मिले तो मिल जाता, दुनिया भर का शोर।।

रात भी कहने लगी, अब तो आ जा करीब,
मुझमें ही खो जाएगा, तेरी यादों का सलीब।
चाँद की बारातें हों, हम दोनों के नाम,
पल-पल तेरी धुन गाए, दिल का यह मयूर।।

तेरी बाहों में सिमटकर, हर लम्हा जीना चाहूँ,
तेरे चेहरे की रोशनी में अपना जहां बसाऊँ।
तेरी धड़कन से मिले जो, वही मेरा सुकून,
तेरे प्यार में खोकर मैं बन जाऊँ तेरे जुनून।।

रात ओढ़े फूलों-सी, हल्की-हल्की बयार,
हवा में घुलती यादों का बजता है झंकार।।

महेंद्र मजबूर ©️®️

विरासत अब बेटी की

 

विरासत अब बेटी की

हालातों की धूल में दबी थी दिल की मजबूरी,
सदियों से सुनते आए थे— विरासत बेटे से पूरी।
पर एक दिन आँसूओं ने सवाल ये पूछ लिया,
क्या नाम के बिना भी कोई रिश्ता अधूरा रहा?
बेटियाँ आशाओं की ज्योत, सपनों की रखवाली,
वे ही संभालती हैं घर-आँगन की हर दीवारी।
कंधों पर जिम्मेदारियों की अनगिनत परतें,
फिर भी दुनिया बेटों को ही बताती रही, ज़रूरतें।
बाप के सीने से लग रो पड़ीं वो मासूम बाँहें,
कह गईं— हम भी तो तेरी साँसों की ही चाहें!
वक़्त ने भी सोचा— अब ये फैसले बदलेंगे,
विरासत के मायने कल की पीढ़ी गढ़ेंगे।
नाम से नहीं, कर्मों से पहचानें बनती हैं,
घर की नींवों में बेटियाँ भी शामिल रहती हैं।
अब कौन रोकेगा? दीवारें ढहने लगी हैं,
विरासत की कुंजी बेटियाँ गढ़ने लगी हैं।

- महेंद्र 'मजबूर'©️®️

रविवार, 30 नवंबर 2025

तुम्हारा प्रेम

 कितना छोटा-सा प्रेम था तुम्हारा,

मानो किसी मौसम की घड़ी—
आया, ठहरा,
और कुछ ही पलों में लौट गया।

पर मेरा प्रेम…
वह किसी नदी की तरह है—
धीमी, लगातार बहती हुई,
चट्टानों से टकराकर भी
अपना स्वर नहीं खोती।

तुम्हारा स्नेह तो
थोड़ी-सी धूप जैसा था—
जिसे बादलों ने छुपा लिया।
मेरा प्रेम उस मिट्टी जैसा है
जो धूप-छाँव हर बार सहकर भी
अपनी खुशबू नहीं छोड़ती।

मैंने तुम्हें शब्दों में नहीं बाँधा—
शब्द खुद तुम्हारी ओर खिंचते चले आए।
अब ये पन्ने
मेरे जिये हुए दिनों की तरह
तुम्हारी छाया सँभाले बैठे हैं।

तुम रहो या न रहो,
मेरे भीतर एक धीमी-सी लौ जलती रहेगी,
जो प्रेम को कम नहीं होने देगी—
जो मेरे बाद भी कहेगी,
उसी शांत-सी करुण मुस्कान के साथ—

तुम हो… ना हो…
मेरा प्रेम तो रहेगा ही।

महेंद्र मजबूर 


जाता हुआ नवम्बर

 जाता हुआ नवम्बर

जैसे कोई आख़िरी चिट्ठी बिना पढ़े रखी रह जाए,
और हम सोचते रहें—
इसमें क्या लिखा होगा?

मौसम बदलता है
तो पता चलता है
कि सिर्फ़ हवा ठंडी नहीं होती,
कुछ रिश्ते भी ठंडे पड़ने लगते हैं।

साल बदल रहा है—
कैलेंडर में नहीं,
हमारी आदतों में,
हमारी चुपियों में,
उन सवालों में जिनके जवाब
कभी मिल ही नहीं पाते।

लोग बदलते हैं,
और हम सोचते रहते हैं
कि शायद अगली बार वे वहीं मिलेंगे
जहाँ हमने छोड़ा था—
पर कोई भी वहीं नहीं मिलता।

वक़्त बदलता है
तो हम समझते हैं
कि कहानियाँ बस लिखी नहीं जातीं,
वे मिटती भी रहती हैं
जैसे किसी पुराने फोटो में
चेहरे धीरे-धीरे धुँधले हो जाते हैं।

ज़िंदगी…
वह चलती तो है,
पर हर मोड़ पर थोड़ी टूटती भी है।
किसी से प्यार करते-करते
हम खुद को खो भी देते हैं,
और पाते भी हैं।

जाता हुआ नवम्बर
सिर्फ़ मौसम नहीं,
वह एक नोट है—
जो कहता है:
चलो आगे,
जहाँ जो भी बदलेगा
वही सच होगा।

महेंद्र 'मजबूर'©️®️

शनिवार, 29 नवंबर 2025

बेवफाई

 मेरी आँखों से गिरा आँसू—सवाल-ए-बेवफ़ाई है,

तेरी पलकों से जो टपका वो गवाह-ए-बेवफ़ाई है।

तू गया तो सच कहूँ दिल पर अभी तक है चुभन बाकी,
तेरी यादों का समुन्दर आज राह-ए-बेवफ़ाई है।

तेरे वादों पर यक़ीं था, इश्क़ में हसरतें भी थीं,
वक़्त के हाथों ये सब कुछ बस दास्तान-ए-बेवफ़ाई है।

मेरा रंजिश में भी तेरे नाम का ही ज़िक्र रहता है,
हर एहसास-ए-वफ़ा अब बस फ़साना-ए-बेवफ़ाई है।

तू लौटे भी तो दिल पर फिर वही पड़ जाएगी दरार,
जो टूटा है वो टूटा है—नसीहत-ए-बेवफ़ाई है।

-महेंद्र ‘मजबूर’

मैं पुरुष हूँ, पत्थर नहीं।

 मैं पुरुष हूँ,

पत्थर नहीं।


मैं भी प्रताड़ित होता हूं,

मैं भी घुटता हूं…

अंदर ही अंदर पिसता हूं,

टूटकर भी मुस्कुराता हूं,

बिखरकर भी संभल जाता हूं।


मैं रो नहीं पाता,

कह नहीं पाता,

दिल की हर दरार भीतर ही समेट लेता हूं।

पत्थर नहीं हूं…

बस समय ने जकड़ लिया है मुझे,

मैं भी किसी कंधे पर सिर रखकर

फूट-फूटकर रो लेना चाहता हूं।


मैं भी तरस जाता हूं

किसी के स्पर्श-भर के प्यार को,

एक शब्द की तसल्ली को,

एक पल की राहत को।


मगर मैं पुरुष हूं—

सो खामोशी मेरी पहचान बना दी गई,

मजबूती मेरी मजबूरी कह दी गई,

आंसुओं को हार का ताज पहना दिया गया।


पर आज कहता हूं—

मैं भी इंसान हूं,

मेरी भी धड़कनें हैं, डर हैं, थकान है,

मेरी भी एक दुनिया है जो टूटती-सी लगती है।


मैं पुरुष हूं…

पर पत्थर नहीं।

मैं भी पिघलना चाहता हूं,

जीना चाहता हूं,

सुन लिया जाऊं—

बस इतना चाहता हूं।


-महेंद्र 'मजबूर'

मै ही प्रतिवादी

 

मैं देखता हूँ—
दूसरों की कमियों का विराट जंगल,
जहाँ दोषों की लतरें साँप-सी फुफकारती हैं,
और मैं, एक शिकारी की तरह,
निशाने साधता हूँ हर अँधेरे पर।

पर अचानक—
मेरे भीतर की नंगी दीवारें हिलने लगती हैं,
मेरे ही मन की दरारों से
किसी गहरे अपराध की गंध उठती है।

हाँ, मैं जानता हूँ—
दुनिया की सारी उँगलियाँ बाहर की ओर मुड़ सकती हैं
पर मेरी अपनी उँगली काँपती है,
जब उसे खुद पर टिकाना पड़ता है।

क्या यही मेरा सच है?
मेरी आत्मा के नीचे छुपा वह गाढ़ा काला द्रव,
जहाँ हर गलती का हिसाब है,
पर मैं उसे छोटा कर देता हूँ,
दूसरों की भूलों को पर्वत बनाकर।

यह दोहरा चेहरा,
यह अजीब, अनाम, अतल अपराधबोध—
जो मेरे भीतर जलता रहता है,
एक धीमी आग की तरह।

मैं सोचता हूँ—
दुनिया बदतर नहीं है,
हमारे अंदर की वह छोटी-सी अंधी जगह है
जहाँ हम सत्य से मुड़ जाते हैं,
जहाँ आत्म-निरीक्षण सबसे बड़ी पराजय लगता है।

क्योंकि सच तो यह है—
कि दूसरों पर प्रश्नचिह्न लगाना सरल है,
पर खुद के भीतर उतरना,
सबसे क्रूर यात्रा है।

और वहीं कहीं,
मेरी मनुष्यता का हिसाब लिखा है…
जिसे पढ़ने से मैं सबसे ज़्यादा डरता हूँ।

महेंद्र "मजबूर"

इज्ज़त का सफर

 इज्ज़त का सफर



चलो निकलो बिना सहारे,

ख्वाबों को झोली में लेकर,

कुछ रास्ते तुम्हें रोकेंगे,

कुछ चल देंगे तुम्हारे संग होकर।


खाली जेब का हर सिक्का,

तजुर्बों से भर जाएगा,

जो झुककर हँसता है आज,

कल वही सिर उठाकर चमक जाएगा।


इज़्ज़त खरीदी नहीं जाती,

पसीने से उगानी पड़ती है,

गिरने की भी एक कीमत होती है,

और उठने की भी कहानी पड़ती है।


कदम मुश्किल ज़रूर होंगे,

मगर मंज़िलें भी इंतज़ार में हैं,

हर संघर्ष में एक सबक है,

हर हार जीत की तैयार में है।


खाली हाथ से जो चल पड़े,

उसी ने दुनिया जीती है,

वहम छोड़ो—हक़ीक़त कहती है,

इज़्ज़त मेहनत से ही मिलती है।


महेंद्र 'मजबूर'

मजबूरी का तख्त

 हमें कभी मुकद्दस निगाहों से देखा ही नहीं गया,

हमारे भीतर की रोशनी को समझा ही नहीं गया।
हमने दिलों में महल बनाए, उम्मीदें सजाईं,
पर ज़माने ने हमें पैरों की ख़ाक समझा।

हम राजा थे अपने सपनों के, अपनी रूह के,
मगर हालातों ने हमें मजबूर सा लिख दिया।
किस्मत की लकीरों में ताक़त थी बहुत,
पर हाथों में ज़ंजीरों का वक़्त थमा रहा।

हम मुस्कुराए भी तो दर्द की कीमत देकर,
हम चले भी तो रेत पर काँटे रखकर।
शान छुपाकर भी सीना तान कर चलते रहे,
क्योंकि हक़ था हमारा—भले दुनिया ने न दिया।

हम मजदूर भी थे, हम ही शहंशाह भी,
बस अंतर इतना था—दुनिया ने हमें जाना नहीं।
हमारे भीतर जो आग थी, उसने हमेशा कहा—
राजा होना ताज पहनना नहीं, गिरकर भी खड़ा रहना है।

महेंद्र 'मजबूर'

आग का यात्री

 

आग का यात्री

मैंने बचपन खो दिया था—
किसी अदृश्य उद्घोष की तरह,
जहाँ मासूमियत का स्वर
समय की फटी किताबों में दबा पड़ा था।

फिर मैं गिरा—
मनुष्य की उस खोह में,
जहाँ छल है, धोखा है, पाखंड है,
और हर चेहरा एक मुखौटा,
हर हाथ पर झूठ की परतें।

यह जीवन नहीं—
एक भट्टी है,
जहाँ मैं स्वर्ण नहीं,
बल्कि आग में उलझा हुआ प्रश्न हूँ।

धधकता हुआ अहंकार—
कभी मुझे जला देता है,
कभी मुझे बुझा देता है,
पर मैं न पूर्ण राख हूँ
न पूर्ण ज्योति।

मैं धुआँ हूँ—
त्रिशंकु-सा लटका,
अधूरी मृत्यु के अँधेरे में।

क्योंकि ज्ञान एक ऐसा दंश है
जो लौटने नहीं देता,
अनुभव एक ऐसा सत्य
जो भुलाया नहीं जा सकता।

मैं समय के विरुद्ध नहीं,
पर उसके भीतर जूझ रहा हूँ—
उस नदी में जहाँ लौटना वर्जित है,
और आगे बढ़ना अनिवार्य।

हाँ, सोना निखरता है आग में,
पर हमेशा जलता रहे—
यह भी एक कैद है!

इसलिए मैं संघर्ष करता हूँ—
अपने भीतर के मनुष्य से,
अपनी ही राख से,
अपने ही अंधकार से।

एक दिन
यह आग मुझे मुक्त करेगी—
या तो मैं जलकर समाप्त हो जाऊँगा,
या स्वर्ण की अंतिम चमक में
अपने भीतर का सत्य पा लूँगा।

-महेंद्र 'मजबूर'

शुक्रवार, 28 नवंबर 2025

अधूरी ज़िंदगी

 अधूरी ज़िंदगी 

ज़िंदगी, तू सच में हसीं है,
फूलों की महक, हवा की सरसराहट — सब तेरी है।
फिर भी…
जब वह पास नहीं,
तू अधूरी सी लगती है।

हर सुबह में तेरी रौशनी है,
हर शाम में तेरे रंग हैं,
फिर भी…
उसकी यादों के बिना,
तेरी खुशियाँ भी कुछ फीकी सी हैं।

मैं चलता हूँ तेरे रास्तों पर,
साँसें भरता हूँ तेरी हवा में,
फिर भी…
उसके बिना, मेरी ज़िंदगी
जैसे अधूरी कहानी सी है।

तेरी हँसी भी अधूरी है,
तेरी ख़ुशियाँ भी अधूरी हैं,
और मैं…
बस उसका इंतजार करता हूँ,
कि लौट आए, और तू पूरी सी लगे।

-महेंद्र 'मजबूर'

बाकी तो नहीं

मेरे दिल में तेरी यादों का कोई असर बचा बाकी तो नहीं,

तेरी मोहब्बत की राख में कोई चिन्ह जगा बाकी तो नहीं।

तेरे जाने से टूटी हर आस, हर ख्वाब अधूरा रहा,
इन ख़ामोशियों में कोई पुरानी दुआ बाकी तो नहीं।

तेरी आँखों की गहराई में मेरी साँसें खो गईं,
इस वीराने में कोई तेरी याद बसा बाकी तो नहीं।

हर दर्द मैंने अपने भीतर सहा और संभाला है,
इन अश्क़ों में कोई राहत छुपा बाकी तो नहीं।

तेरी हँसी की हल्की आहट आज भी दिल को छूती है,
इन पलकों में कोई रोशनी जगा बाकी तो नहीं।

हमने जो वादे कभी निभाने की ठानी थी,
इन फासलों में कोई निशां बचा बाकी तो नहीं।

आख़िरी बार पूछ लें दिल से ये सवाल,
तेरे बिना हमारे बीच मोहब्बत बचा बाकी तो नहीं।

तुम्हारे लौटने की राह अब भी वीरान है,
इन रास्तों में कोई ठंडी छाँव जगा बाकी तो नहीं।

जो खोया, उसे यादों में सावधानी से रखा है,
इन लम्हों में कोई ख़ुशी बसी बाकी तो नहीं।

तेरे बिना यह जीवन आधा और सुनसान लगता है,
इस दुनिया में कोई साया, कोई हमसफ़र बाकी तो नहीं।

यादों का सिलसिला अब भी धीरे चलता है,
इन रातों में कोई चिंगारी जगा बाकी तो नहीं।

मेरी तन्हाई अब सिर्फ़ तेरे नाम की गवाही देती है,
इन दीवारों में कोई आवाज़ बाकी तो नहीं।

तूने जो छोड़ दिया, वह दर्द अब तक मेरे साथ है,
इस बिखरे दिल में कोई राहत बची बाकी तो नहीं।

हर साँस में तेरी कमी गहरी तरह महसूस होती है,
इस जीवन में कोई राहत जगा बाकी तो नहीं।

और जब चाँद भी तन्हा आसमान में झिलमिलाता है,
इस दिल की खामोशी में कोई रोशनी बाकी तो नहीं।

महेंद्र "मजबूर"©️®️

प्रेम का दार्शनिक अनुवाद

 प्रेम का दार्शनिक अनुवाद

मेरे हृदय की अक्षरित संवेदना का
तुम ही परम-उद्गम हो,
अधरों पर ठिठकी व्याख्याओं की
अनुत्तरित प्रतिध्वनि हो तुम।

तुम ही समय की अनंत धारा में
अस्तित्व का शाश्वत अनुलेपन,
धड़कनों के अंतरालों में
प्रेम का पवित्रतम संलेपन।

तुम ही मौन की मर्मज्ञ व्याख्या,
निशब्दताओं का गहन शब्दार्थ,
तुम ही अंतरतम की वेदना में
स्पंदित सौंदर्य का अंतिम अर्थ।

जैसे नयनों में जमता रहा
भावों का अतल-संलयन,
तुम हो मेरे समस्त अनुभूतियों का
एकमात्र सूक्ष्म-संवेदन।

मेरे हृदय में परिभाषित प्रेम की
अदृश्य, अविनश्वर संरचना हो तुम—
तुम ही ध्येय, तुम ही सार,
प्रेम का दार्शनिक अनुवाद भी तुम। 

महेंद्र "मजबूर"©️®️

सोमवार, 10 नवंबर 2025

कागज़ की नाव

 

कागज़ की नाव 

हम सपनों में रचते रहे, कागज़ की वह नाव,
नदियों में खोजते रहे, जीवन का प्रवाह।

बचपन की धूप थी सरल, छांव में थी माया,
हर लहर में दिखती थी, जग की मीठी छाया।

पर जब प्रौढ़ता आई, बढ़ी लहरों की धुन,
भंवरों ने तोड़ दिए, वो नन्हे स्वप्न गुन।

मन के तट पर आज भी, बचपन का वह भाव,
कभी भिगो दे आँख को, कभी करे विलाप।

सीखा तब हमने यही — यही जग का मर्म,
निर्मल हृदय के गीतों में, छिपे जीवन के कर्म।

फिर भी भीतर कहीं वही, नन्ही नाव तिरती,
भंवरों से लड़ती हुई, मुस्कान लिए गिरती।

महेंद्र मजबूर 

नदी का तीर

 

नदी का तीर 

अब भी भाता है मुझे, वही नदी का तीर,
जहाँ बैठकर थी मिली, मुझे कुंवारी पीर।

नीरव था वन, झुकीं तरुवर की कोमल डालें,
लहरों में झलके थे नभ के सपनों के जाले।
मृदु पवन बही थी जैसे किसी का आह्वान,
और धरा ने ओढ़ लिया था संध्या का मान।

उस क्षण की हल्की मुस्कान, अधरों की लोरी,
बन गई हृदय में गूंजती, एक मधुर सिंधु-गोरी।
वह प्रथम वेदना, जो प्रेम से पहले आई,
आज भी स्मृति में वही दीपिका बन छाई।

समय की धारा बह गई, सब कुछ ले डोली,
पर मन के घाट न सूखे, वे पीड़ा की बोली।
अब भी जब संध्या ढले, सुनूं वही नीर,
जहाँ बैठकर थी मिली, मुझे कुंवारी पीर।

महेंद्र मजबूर 

तुम बनो प्रभात

 तुम बनो प्रभात


जब मन में छाए घने अंधियार,

टूटे सपनों का हो संसार,

तब तुम आना, बन किरण उजाल,

मन को देना नया खयाल।।


तुम बनो प्रभात, ओ स्नेहिल साथ,

अंधेरी रात में, तुम ही तो विश्वास।

तुम बनो प्रभात, ओ मन के पास,

हर पीड़ा में तुम हो आस। 


जब थम जाए जीवन की राह,

ना हो कोई अपना अथवा चाह,

तब तुम बन जाना मुस्कान,

भर देना फिर से अरमान।।


तुम बनो प्रभात, ओ स्नेहिल साथ,

अंधेरी रात में, तुम ही तो विश्वास।

तुम बनो प्रभात, ओ मन के पास,

हर पीड़ा में तुम हो आस। 


जब हर दिशा मौन हो जाए,

दिल में बस सन्नाटा छाए,

तब तुम गुनगुनाना धीरे,

सपनों को जगाना पीरे।।


तुम बनो प्रभात, अमर उजियारा,

जीवन हो फिर से प्यारा।

तुम बनो प्रभात…

तुम बनो प्रभात… 


 #महेंद्र मजबूर ©️®️

वो एक अधूरा गाना

वो एक अधूरा गाना

छूट गया कहीं वो पल सुहाना,
भुला दिया जो एक अफसाना,
पर दिल की गहराई में अब भी,
गूँज रहा है उसका तराना।
कोई खामोशी है भीतर बसी,
जो बोल नहीं, बस सुनती है,
हर सांस में उसकी हल्की-सी खुशबू,
अब भी धीमे से छनती है।
मैं धुन गुनगुनाता रहा उम्र भर,
वो गीत रहा अधूरा मगर,
हर सुर में उसकी याद मिली,
हर शब्द में उसका असर।
कहना चाहा कई दफ़ा,
पर लफ़्ज़ कहीं रुक जाते हैं,
कुछ एहसास बस जीए जाते हैं,
कभी ज़ुबां तक नहीं आते हैं।
अब जब भी रात उतरती है,
सन्नाटा गाता है वो गाना,
जो पूरा कभी न हो सका,
फिर भी दिल में है वो अफसाना।

#महेंद्र "मजबूर"

बाबा... क्या मैं पराई हूँ...?

 

बाबा... क्या मैं पराई हूँ...?

बाबा...
क्या मैं पराई हूँ...?
जब मैं पहली बार हँसी थी,
आपकी आँखों में जो चमक थी...
वो क्या कुछ बरसों की ही थी...?

जब आप मुझे कंधों पर बिठाकर कहते थे —
“मेरी गुड़िया, मेरी राजकुमारी...”
क्या उस राजकुमारी का राज
किसी और के घर में था, बाबा...?

जब मैं स्कूल से दौड़ती हुई आती थी,
आप कहते थे — "धीरे भाग बेटी!"
क्या उस वक़्त भी आप जानते थे
कि एक दिन मैं सच में... दूर चली जाऊँगी...?

बाबा...
जब मैं साड़ी पहनूँगी पहली बार,
आप नज़रें झुका लेंगे...?
या पलटकर देखेंगे भी नहीं...?

जब मैं विदा लूँगी...
क्या मेरे आँसुओं को
आप अपनी हथेलियों में समेट लेंगे,
या बस हवा में छोड़ देंगे...?
बाबा...
माँ कहती है, “लड़की का घर तो ससुराल होता है।”
तो ये घर क्या है, बाबा...?
जहाँ दीवारों पर मेरी हँसी है,
जहाँ मेरे पैरों की आहटें गूँजती हैं —
क्या ये सब मिट जाएगा...?

क्या मैं मिट जाऊँगी...?
जब कोई और कमरे में सोएगा,
जहाँ मैं गुड़ियों से बातें करती थी...
क्या वो गुड़िया भी चुप हो जाएँगी...?
बाबा...
क्या आप मेरे बाद कमरे का दरवाज़ा बंद कर देंगे...?
या रोज़ चुपचाप खोलेंगे,
बस यह देखने कि मैं लौट आई क्या...?

जब मैं किसी और घर में “बहू” बनूँगी,
किसी के लिए “माँ” बनूँगी...
तो मेरे भीतर जो “आपकी बेटी” है —
वो कहाँ जाएगी...?
कौन पुकारेगा मुझे वैसे —
“अरे बिटिया... आज फिर बाल उलझे हैं!”

बाबा...
क्या मैं सच में पराई हूँ...?
या ये दुनिया झूठ बोलती है...?
क्यों हर आँगन मुझे अपनाने से पहले
छोड़ने की तैयारी करता है...?

बाबा...
अगर सच में मैं पराई हूँ —
तो मेरा मन इतना अपनों सा क्यों धड़कता है...?
क्यों हर दर्द में आपका नाम निकलता है...?
बस एक बार...
बस एक बार कह दो बाबा —
कि मैं तुम्हारी थी...
तुम्हारी हूँ...
और तुम्हारी ही रहूँगी...

फिर चाहे यह दुनिया हज़ार बार कहे —
“लड़की तो पराई होती है...”

-महेंद्र "मजबूर "©️®️